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Wednesday, January 1, 2020

नागरिकता संशोधन क़ानून: बीजेपी क्या इस तरह मुसलमानों का भरोसा जीत पाएगी?

बाद में उन दोनों को उनके घर से ही गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया गया. शोएब को तो मजिस्ट्रेट के सामने भी नहीं पेश किया गया जबकि दारापुरी को मजिस्ट्रेट ने ख़ुद जेल भेजने से मना किया. आख़िर वे दोनों जब घर पर नज़रबंद थे तो उन्होंने किस तरह से प्रदर्शन में हिस्सा लिया, ये लखनऊ की पुलिस ही बता सकती है."

एसआर दारापुरी के पौत्र सिद्धार्थ दारापुरी ने अपने पिता की गिरफ़्तारी के बारे में सोशल मीडिया में बेहद भावुक टिप्पणी करते हुए उनके बारे में जानकारी दी थी, "एसआर दारापुरी वह शख़्स हैं, जिन्होंने भारतीय पुलिस सेवा के एक ईमानदार और कर्मठ अधिकारी के रूप में 30 वर्षों तक देश की सेवा की. जिन्हें अपने जूनियर और सीनियर अधिकारियों से बराबर प्यार मिला.

जिन्होंने एक भागते हुए उपद्रवी को तब भी नज़दीक से गोली नहीं मारी, जब वह उनकी जीप पर गोली दाग रहा था. जो अकेले एक गैंग का आत्मसमर्पण कराने के लिए गए और उस गैंग के किसी सदस्य का एनकाउंटर नहीं किया. जिन्होंने कभी जाति के आधार पर बंटी हुई पुलिस मेस की व्यवस्था को बदल दिया. जिन्होंने अपने सर्विस रिवॉल्वर से कभी एक गोली नहीं दागी."

लखनऊ के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पूर्वी सुरेश चंद्र रावत का कहना था, "एसआर दारापुरी, सदफ़ जफ़र, दीपक कबीर और मो. शोएब को हज़रतगंज पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल भेजा था. चारों पर आरोप हैं कि उन्होंने धारा 144 लागू होने के बाद भी ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से लोगों को बुलाकर सम्मेलन किया, जिसके दौरान उपद्रव और हिंसा हुई."

एएसपी रावत ने बताया कि हिंसा से हुई संपत्ति के नुक़सान की वसूली के लिए एक-दो दिन में जांच पूरी करके चारों को नोटिस भेजा जाएगा और चारों की संपत्ति कुर्क करके पुलिस नुक़सान की भरपाई करेगी.

आइए जानते हैं कि ये कौन लोग हैं जिन्हें पुलिस ने पहले गिरफ़्तार किया और अब उनकी संपत्ति कुर्क करने की तैयारी कर रही है.

77 वर्षीय रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी एक मानवाधिकार कार्यकर्ता, ख़ासकर दलितों और आदिवासियों के हित में काम करने वाले समाजसेवी के रूप में जाने जाते हैं. 19 दिसंबर को लखनऊ में विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के मामले में उन्हें गिरफ़्तार किया गया था.

1972 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे एसआर दारापुरी पुलिस सेवा से रिटायर होने के बाद सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काम करते रहे हैं. दारापुरी साल 2019 में लोक राजनीति मंच नामक संगठन के बैनर तले लखनऊ सीट से लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं. इस संगठन की स्थापना साल 2004 में मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर ने की थी.

एसआर दारापुरी के परिजनों और उनके क़रीबियों के अनुसार, वो आंबेडकर महासभा समेत तमाम संगठनों में भी सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं. मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय भी दारापुरी के साथ सामाजिक कार्यों में शामिल रहे हैं.

संदीप पांडेय बताते हैं, "19 दिसंबर को पुलिस ने एडवोकेट मोहम्मद शोएब और दारापुरी के साथ मुझे भी पहले से ही अपने-अपने घरों में नज़रबंद कर दिया था.

दारापुरी के परिजनों का कहना है कि दारापुरी कैंसर से पीड़ित हैं और उनकी पत्नी भी लंबे वक्त से बीमार हैं.

मोहम्मद शोएब पेशे से वकील हैं और रिहाई मंच नामक संगठन के संस्थापक हैं. इस मंच के ज़रिए ये लोग ऐसे लोगों का मुक़दमा लड़ते हैं जिन्हें बेवजह मुक़दमों में फँसाया जाता है और ग़रीबी या किन्हीं अन्य विवशताओं की वजह से ये लोग ख़ुद की पैरवी नहीं कर पाते हैं या कोई वकील नहीं कर पाते हैं. मोहम्मद शोएब भी नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में जेल भेजे गए हैं.

मोहम्मद शोएब शुरुआती दौर से ही सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े रहे और मौजूदा समय में सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं. इस पार्टी की छात्र इकाई से जुड़े रहने के दौरान 1960 के दशक में वो छात्र आंदोलन में हिस्सा लेने के चलते जेल भी गए. साल 1972 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से क़ानून की पढ़ाई की और उसके बाद से ही लखनऊ में वक़ालत कर रहे हैं.

संदीप पांडेय बताते हैं, "मोहम्मद शोएब ने एक कार्यक्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरि के सामने ही अपनी डिग्री यह कहते हुए जला दी थी कि युवाओं को डिग्री की नहीं, नौकरी की ज़रूरत है. इस अपराध के लिए उन पर उस वक़्त पचास रुपये का अर्थदंड लगा था और आगे किसी भी कक्षा में प्रवेश लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया."

रिहाई मंच नामक संस्था के ज़रिए मोहम्मद शोएब और उनके साथियों ने ऐसे कई लोगों को अदालत से बरी कराया है जिनके ख़िलाफ़ चरमपंथी घटनाओं में शामिल होने या फिर साज़िश करने का आरोप लगा था.

नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध करने के आरोप में लखनऊ की रहने वालीं सदफ़ जाफ़र को भी गिरफ़्तार किया गया है. कांग्रेस कार्यकर्ता और फ़िल्म अभिनेत्री सदफ़ जाफ़र 19 दिसंबर को प्रदर्शन के दौरान हो रही हिंसा का विरोध करते हुए फ़ेसबुक लाइव कर रही थीं. सदफ़ पुलिस वालों से ये भी अपील कर रही थीं कि इन लोगों को क्यों नहीं पकड़ा जा रहा है. लेकिन, अगले दिन उन्हें भी गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया गया.

शिक्ष‍ि‍का रह चुकीं सदफ़ फ़िल्म निर्माता मीरा नायर की आने वाले फ़िल्म 'ए सूटेबल ब्वॉय' में भी काम कर चुकी हैं. लखनऊ की रहने वाली सदफ़ की निजी ज़िंदगी काफी उथल-पुथल भरी रही है. उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि शादी के बाद आठ साल तक पति के साथ रहीं लेकिन पति की प्रताड़ना से इतना तंग आ गई थीं कि आत्महत्या तक करने की कोशिश की.

दीपक कबीर लखनऊ के जाने माने थिएटर कलाकार और कवि हैं. दीपक लखनऊ में कबीर फ़ेस्टिवल नाम का एक साहित्यिक कार्यक्रम भी हर साल आयोजित करते हैं.

दीपक के मित्र और उनके साथ काम कर चुके प्रेम शंकर राय बताते हैं, "दीपक छात्र जीवन से ही एसएफ़आई के सदस्य भी रहे और फिर लखनऊ में ज़िला स्तर पर भी

शिया कॉलेज में रॉबिन प्रबंधन विभाग में पढ़ाते थे. कॉलेज के कार्यवाहक प्राचार्य डॉ. मिर्जा मोहम्मद अबु तैयब के मुताबिक रॉबिन सेल्फ फ़ाइनेंस योजना के अंतर्गत संचालित बीबीए विभाग में संविदा पर कार्यरत थे.

तैयब ने बताया कि हिंसा मामले में रॉबिन की गिरफ़्तारी की सूचना के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया है. कॉलेज ने उनकी संलिप्तता की जांच के लिए एक आंतरिक कमेटी भी बनाई है जिसकी जांच रिपोर्ट के बाद कॉलेज आगे की कार्रवाई पर विचार करेगा.

उसके प्रभारी रहे. हम लोगों ने एसएफ़आई में लखनऊ विश्वविद्यालय में और फिर नौजवानों के साथ काम किया है. दीपक शुरू से ही सांस्कृतिक अभिरुचि का व्यक्ति था इसलिए उसने उसी रास्ते को चुना. कई संस्थाओं से जुड़ा है और थियेटर में सक्रिय है."

दीपक कबीर के परिजनों के मुताबिक वो सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए इवेंट मैनेजमेंट का काम करते हैं. मूल रूप से लखनऊ के दुबग्गा के रहने वाले दीपक के पिता स्कूल में टीचर थे जबकि उनके छोटे भाई पीयूष लखनऊ में वकालत करते हैं.

रॉबिन वर्मा लखनऊ विश्वविद्यालय से जुड़े शिया कॉलेज में पढ़ाते हैं और सामाजिक कार्यों में भी उनकी ख़ासी दिलचस्पी रहती है. रॉबिन वर्मा भी रिहाई मंच से जुड़े हैं और अक़्सर ज़रूरतमंद लोगों के लिए आवाज़ उठाते हैं.

नागरिकता क़ानून का विरोध करने के बाद उन पर दोहरी मार पड़ी. एक ओर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया तो दूसरी ओर शिया कॉलेज ने उन्हें निलंबित कर दिया है.